रातों से दोस्ती
नींद से रिश्ता टूट रहा है
और रातों से दोस्ती हो रही है
और दिन से तो कोई मतलब ही नही रहा
और रहे भी तो कैसे तू है ही नही मेरा हाल पूछने वाला
मुझे डांटने वाला, मुझे मनाने वाला
ये रात ही है जिसकी खामोशी में
तेरा नाम लेकर अपनी धड़कने गिन सकता हूँ
तुझे अपने पास महसूस कर सकता हूँ
मेरी जिंदगी भी अब रात के सन्नाटे सी हो गयी है
जहाँ जरा सी आवाज बहुत दूर तक सुनाई देती है
पर डरता हूँ कहीं तुम्हारा नाम ना निकल जाए
तू बेवजह बदनाम ना हो जाए
तुम गलत नही थे बस तुम्हें गलत इंसान मिल गया
तुम दिन की तलाश में थे और तुम्हें रात मिल गया
वैसे दिन तो मैं कभी बनना भी नहीं चाहता
क्योंकि दिन तो खूबसूरत होता है
और खूबसूरत चीज अक्सर फरेबी होती है
पर तुम कभी रात से भी दिल लगा के देखो
इसके सन्नाटे में एक अलग सा सुकून है
~सौरभ उपाध्याय "कुनाल"
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